सेना में हवलदार बना बकरा, रोज करता है दो बार मार्च पास्ट

लखनऊ। वह हर इशारे को समझता है। धुन बजने पर सावधान होता है तो थमने पर विश्राम। बड़े-बड़े सैन्य अफसरों को इसने सलामी दी है। इसके बिना सेना की पासिंग आउट परेड हो या फिर रस्मी परेड दोनों अधूरी ही लगती है। "कदम कदम बढ़ाए जा" जैसे गीतों पर हवलदार मुन्ना की ड्रिल जवानों को भी अपने बारे में सोचने पर मजबूर कर देती है। सधे हुए हवलदार मुन्ना के कदम कभी भी नहीं लड़खड़ाते।

अब आपको बता दें कि यह हवलदार मुन्ना असल में एक बकरा है जो एएमसी (सेना मेडिकल कोर) की बैंड टुकड़ी में अपनी सेवाएं दे रहा है। सेना मेडिकल कोर का गुडलक हवलदार मुन्ना रोजाना दो बार दो घंटे की परेड का अभ्यास करता है। सुबह और शाम वह बैंड टुकड़ी के साथ सजधज कर कदमताल मिलाता है।

हवलदार मुन्ना के मास्टर ट्रेनर सूबेदार एमएस रेड्डी बताते हैं कि जिस दिन मौसम की खराबी के कारण अभ्यास प्रभावित होता है, उस दिन मुन्ना बेचैन हो जाता है। अभी हवलदार मुन्ना पांच साल का है और अब तक वह 15 बड़ी परेड में शामिल हो चुका है। मुन्ना इसके लिए बैंड टुकड़ी के साथ खूब अभ्यास करता है। खाने में हवलदार मुन्ना को दाल पसंद है जबकि एक आलीशान कमरा उसका आरामगृह है।

गर्मी में एसी की सुविधा तो ठंडी में ब्लोअर और अन्य दूसरे इंतजाम। हवलदार मुन्ना की देखरेख में दो जवानों की हर समय तैनाती भी रहती है। यदि जरा सा भी तबीयत नासाज हुई तो सेना के डॉक्टर उसकी देखभाल करने में जरा भी देरी नहीं करते हैं।

ऐसे पड़ी परंपरा

सेना में 15 जनवरी, 1951 को ग्वालियर के तत्कालीन महाराजा की टुकड़ी का सेना मेडिकल कोर में विलय हो गया था। उनका यह लकी बकरा भी सेना में शामिल हो गया। यह बकरा राजस्थान के बाड़मेर में पाया जाता है। एक बकरे की उम्र 12 साल होती है। लिहाजा सेना बाड़मेर से दूसरा बकरा लाकर उसे पालती और उसे ट्रेनिंग देती है। इनकी तैनाती हवलदार के रूप में होती है और इसी रैंक पर उनकी सेवा समाप्त होती है। हालांकि सेना की ओर से इनके वेतन को तय नहीं किया गया है लेकिन सभी सामाजिक सुरक्षा सेना ही देती है।

Source : naidunia

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