दिल्ली नगर निगम में फिर खिला 'कमल'


दिल्ली एमसीडी चुनाव में 270 सीटों पर रुझान सामने हैं. अगर यही रुझान नतीजों में तब्दील होते हैं तो ये साफ है कि बीजेपी एमसीडी में जीक की हैट्रिक लगाने जा रही है. आइये जानते हैं इन रुझानों के लिए दिल्ली और देश के सियासी खिलाड़ियों के क्या मायने हो सकते हैं?

केजरीवाल का करिश्मा खत्म? 
साल 2015 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने बीजेपी को करारी मात दी थी. ये वो वक्त था जब लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता चरम पर थी. इसी जीत के दम पर कई विश्लेषकों ने आम आदमी पार्टी को विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस का उभरता विकल्प तक बता दिया था. लेकिन एमसीडी चुनाव में मिली हार ये साबित करेगी कि दिल्ली की जनता के बीच केजरीवाल की विश्वसनीयता घटी है. ये तब है जब पार्टी ने गरीब तबकों को बिजली, पानी, शिक्षा जैसी सुविधाएं मुहैया करवाने के बड़े-बड़े दावे किये थे. लिहाजा एमसीडी चुनाव के नतीजे केजरीवाल एंड कंपनी को गुजरात और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों के चुनावी समर में उतरने के बजाए दिल्ली के अपने गढ़ को मजबूत करने पर तवज्जो देने के लिए मजबूर करेगी. जाहिर है कि हार का ठीकरा महज ईवीएम में गड़बड़ी पर फोड़ना पार्टी के काम नहीं आएगा.


बीजेपी की बल्ले-बल्ले
ये कोई राज नहीं है कि दिल्ली के लोग एमसीडी के भ्रष्टाचार से त्रस्त थे. बीजेपी लगातार दो बार के कार्यकाल के बाद सत्ता-विरोधी लहर की आशंका से जूझ रही थी. यही वजह है कि पार्टी ने किसी भी मौजूदा पार्षद को टिकट नहीं दिया. लेकिन तीनों नगर निगमों में बहुमत ये साबित करेगा कि मोदी की लहर अब यूपी के रास्ते दिल्ली भी पहुंची है. इस जीत के बाद एक बार फिर इस बात पर मुहर लगेगी कि मौजूदा सियासत में मोदी ही सबसे ऊंचे कद के नेता हैं. ये जीत दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी के लिए भी किसी तमगे से कम नहीं है. उम्मीद की जा सकती है कि इसके बाद उनका सियासी वजन भी बढ़ेगा और वो पार्टी में किसी बड़ी जिम्मेदारी की आस लगा सकते हैं.

कांग्रेस का कमबैक 
इस चुनाव में अगर किसी पार्टी के पास खोने के लिए कुछ नहीं था तो वो कांग्रेस ही थी. 2015 के विधानसभा चुनाव में पार्टी खाता भी नहीं खोल पाई थी. हालांकि एमसीडी में उसे जीत तो हासिल नहीं हो सकी. चुनाव से पहले अरविंदर सिंह लवली और बरखा सिंह जैसे जाने-माने कांग्रेसी नेताओं ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया. लेकिन चुनाव में आम आदमी पार्टी को कड़ी टक्कर देना  भी पार्टी के लिए उपलब्धि से कम नहीं है. इस नतीजे के बाद पार्टी इस बात पर संतोष कर सकती है कि राजधानी में उसकी सियासी जड़ें अब भी सूखी नहीं हैं और वो कम से कम आम आदमी पार्टी को मात देने में कामयाब रही है.

अन्य पार्टियों के लिए क्या संदेश? 

एमसीडी चुनाव योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की पार्टी स्वराज इंडिया के लिए भी काफी अहम था. आम आदमी पार्टी से निकाले जाने के बाद ये पहला मौका था जब स्वराज इंडिया चुनावी मैदान में उतरी थी. हालांकि रुझान बता रहे हैं कि यादव और भूषण की साफ छवि के बावजूद दिल्लीवालों ने उनपर कोई खास यकीन नहीं किया है. रुझानों में इससे भी ज्यादा बुरी खबर बहुजन समाज पार्टी के लिए छिपी है. आम आदमी पार्टी के तस्वीर में आने से पहले बीएसपी दिल्ली में तीसरे नंबर की पार्टी थी. 2012 के एमसीडी चुनाव में उसे करीब 10 फीसदी वोटों के साथ 12 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. लेकिन इस बार ना सिर्फ बीएसपी की सीटें बल्कि जनाधार भी सिकुड़ा है.

Source : AajTak

एक टिप्पणी भेजें

© ‧ Test. All rights reserved. Distributed by Pixabin