आखिर क्यों हर मंत्र में बोला जाता है “स्वाहा” वजह जानकर हैरान रह जाएंगे!

हम हवन या किसी भी धार्मिक अनुष्ठान में मंत्र पाठ करते हुए स्वाह कहकर ही हवन सामग्री का भोग भगवान को अर्पित क्यों करते है. क्या कभी आपने इसके बारे में सोचा है कि हर मंत्र के बाद में ही क्यों बोला जाता है शब्द “स्वाह”. अगर नहीं तो कोई बात नहीं आज हम आपको बता ने जा रहे है कि अखिर क्यों स्वाह बोला जाता है. बता दें कि स्वाह का अर्थ है “सही रीति से पहुंचाना” या “दूसरे शब्दों में कहे तो जरूरी भौगिक पदार्थ को उसके प्रिय तक”.

श्रीमद्भागवत, शिव पुराण में है जिक्र

कोई भी यज्ञ तब तक पूरा नहीं माना जाता है जब तक कि हवन का ग्रहण देवता न कर लें. लेकिन देवता ग्रेहण तभी कर सकते है जब अग्नी के द्वारा स्वाह के माध्यम अर्पण किया जाए. वहीं श्रीमद्भागवत और शिव पुराण में स्वाह से संबंधित वर्णन आए हैं. इसके अलावा ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि वैदिक ग्रंथों में अग्नी की महत्ताव पर अनेक सूत्रों की रचनाएं हुई हैं.


पौराणिक कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार स्वाह दक्ष प्रजा पति की पुत्री थी. इनका विवाह अग्निदेव के साथ किया गया था. अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से ही हविष्य (हवन के योग्य सामग्री) को ग्रहण करते  हैं और  उनके माध्यम यही हविष्य आह्वान किए गए देवता को प्राप्त होता है. वहीं, दूसरी पौराणिक कथा के मुताबिक अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए.

भगवान कृष्ण ने दिया था वरदान


स्वाह बोलने के एक दूसरी रोचक कहानी भी जुड़ी हुई है. इसके अनुसार, स्वाहा प्रकृति की ही एक कला थी, जिसका विवाह अग्नि के साथ देवताओं के आग्रह पर सम्पन्न हुआ था. भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं स्वाहा को ये वरदान दिया था कि “केवल स्वाह के माध्यम से देवता हविष्य (हवन के योग्य सामग्री) को ग्रहण कर पाएंगे”. यज्ञीय प्रयोजन तभी पूरा होता है जबकि आह्वान किए गए देवता को उनका पसंदीदा भोग पहुंचा दिया जाए.

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